बीते सालों में विज्ञान
के नाम पर
आस्तिकता को झुठलाने
की अनेकों कोशिशें
की गई।आस्तिकता के
अस्तित्व को झुठलाना
सम्भव नहीं। यह
इतना स्पष्ट है
जितना कि हम
स्वयं, हमारा अपना जीवन।
जिन्हें जीवन की
सम्पूर्णता का अहसास
होता है, वे
आस्तिकता की अनुभूति
किए बिना नहीं
रहते। जो आस्तिकता
को नकारते हैं,
दरअसल वे जिन्दगी
को नकारते हैं,
अपने आप को
अस्वीकार करते हैं।
आस्तिकता का मतलब
है, जीवन के
होने की सच्ची
स्वीकारोक्ति, जीवन और
जगत् के सम्बन्धों
की सूक्ष्म व
सघन अनुभूति। लोक
प्रचलन में ईश्वर
के प्रति विश्वास
या आस्था को
आस्तिकता का पर्याय
माना जाता है।
वैदिक विद्वान ‘नास्तिकोवेद
निन्दकः’ कहकर वेदज्ञान
के प्रति आस्था
को आस्तिकता के
रूप में परिभाषित
करते हैं। कई तरह
के व्यंग, कटाक्ष
एवं कटूक्तियाँ उच्चारित
की गयीं। बात
यहाँ तक बढ़ी
कि नास्तिकता को
वैज्ञानिकता का पर्याय
माना जाने लगा।
इस उलटी सोच
ने अनेकों उलटे
काम कराए। समष्टि
जीवन चेतना को
नकारने से स्वार्थपरता
व अहंता को
भारी बढ़ावा मिला।
प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुंध
दोहन हुआ। मानवीय
अहंता की चपेट
में आकर जीव-
जन्तुओं की अनगिनत
प्रजातियाँ नष्ट हुई।
इसी के साथ
प्राकृतिक संकटों के बादल
भी घहराए। पर्यावरण
संकट, मौसम के
संकट, भाँति- भाँति
की बीमारियाँ, महामारियाँ,
आपदाएँ इन्सानी जिन्दगी को
दबोचने की तैयारियाँ
करने लगीं। स्वार्थलिप्सा
से ग्रसित अहंकारी
मानव को मनोरोगों
ने भी धर
पटका। यह सब
हुआ क्यों? किस
तरह? और कैसे?
इन सवालों के
जवाब की ढूँढ
खोज में जब
वैज्ञानिक जुटे तो
उन्होंने अपने प्रयोगों
के निष्कर्ष में
यही पाया कि
समष्टि चेतना के अस्तित्व
को नकारा नहीं
जा सकता।
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